Sundarkanda | सुंदरकांड : Sarga 8

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SARGA 8






स तस्य मध्ये भवनस्य संस्थितं

महद्विमानं मणिवज्रचित्रितम्।

प्रतप्तजाम्बूनदजालकृत्रिमं

ददर्श वीरः पवनात्मजः कपिः।।5.8.1।।





तदप्रमेयाप्रतिकारकृत्रिमं

कृतं स्वयं साध्विति विश्वकर्मणा।

दिवं गतं वायुपथप्रतिष्ठितं

व्यराजतादित्यपथस्य लक्ष्मवत्।।5.8.2।।






न तत्र किञ्चिन्न कृतं प्रयत्नतो

न तत्र किञ्चिन्न महार्हरत्नवत्।

न ते विशेषा नियताः सुरेष्वपि

न तत्र किञ्चिन्न महाविशेषवत्।।5.8.3।।





तपः समाधानपराक्रमार्जितं

मनः समाधानविचारचारिणम्।

अनेकसंस्थानविशेषनिर्मितं

ततस्ततस्तुल्यविशेषदर्शनम्।।5.8.4।।






विशेषमालम्ब्य विशेषसंस्थितं

विचित्रकूटं बहुकूटमण्डितम्।

मनोऽभिरामं शरदिन्दुनिर्मलं

विचित्रकूटं शिखरं गिरेर्यथा।।5.8.5।।





वहन्ति यं कुण्डलशोभिताननाः

महाशना व्योमचरा निशाचराः।

विवृत्तविध्वस्तविशाललोचनाः

महाजवा भूतगणाः सहस्रशः।।5.8.6।।





वसन्तपुष्पोत्करचारुदर्शनं

वसन्तमासादपि कान्तदर्शनम्।

स पुष्पकं तत्र विमानमुत्तमं

ददर्श तद्वानरवीरसत्तमः।।5.8.7।।





इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे अष्टमस्सर्गः।।







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