Sundarkanda | सुंदरकांड : Sarga 24

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SARGA 24





ततः सीतामुपागम्य राक्षस्यो विकृताननाः।

परुषं परुषा नार्य ऊचुस्तां वाक्यमप्रियम्।।5.24.1।।





किं त्वमन्तःपुरे सीते सर्वभूतमनोहरे।

महार्हशयनोपेते न वासमनुमन्यसे।।5.24.2।।



ानुषी मानुषस्यैव भार्यात्वं बहुमन्यसे।

प्रत्याहर मनो रामान्न त्वं जातु भविष्यसि।।5.24.3।।





त्रैलोक्यवसुभोक्तारं रावणं राक्षसेश्वरम्।

भर्तारमुपसङ्गम्य विहरस्व यथासुखम्।।5.24.4।।




मानुषी मानुषं तं तु राममिच्छसि शोभने।

राज्याद्भ्र्रष्टमसिद्धार्थं विक्लबं त्वमनिन्दिते।।5.24.5।।





राक्षसीनां वचः श्रुत्वा सीता पद्मनिभेक्षणा।

नेत्राभ्यामश्रुपूर्णाभ्यामिदं वचनमब्रवीत्।।5.24.6।।






यदिदं लोकविद्विष्टमुदाहरथ सङ्गताः।

नैतन्मनसि वाक्यं मे किल्बिषं प्रतिभाति वः।।5.24.7।।




न मानुषी राक्षसस्य भार्या भवितुमर्हति।

कामं खादत मां सर्वा न करिष्यामि वो वचः।।5.24.8।।




दीनो वा राज्यहीनो वा यो मे भर्ता स मे गुरुः।

तं नित्यमनुरक्तास्मि यथा सूर्यं सुवर्चला।।5.24.9।।





यथा शची महाभागा शक्रं समुपतिष्ठति।

अरुन्धती वसिष्ठं च रोहिणी शशिनं यथा।।5.24.10।।

लोपामुद्रा यथागस्त्यं सुकन्या च्यवनं यथा।

सावित्री सत्यवन्तं च कपिलं श्रीमती यथा।।5.24.11।।

सौदासं मदयन्तीव केशिनी सगरं यथा।

नैषधं दमयन्तीव भैमी पतिमनुव्रता।।5.24.12।।

तथाऽहमिक्ष्वाकुवरं रामं पतिमनुव्रता।





सीताया वचनं श्रुत्वा राक्षस्यः क्रोधमूर्छिताः।।5.24.13।।

भर्त्सयन्ति स्म परुषैर्वाक्यै रावणचोदिताः।






अवलीनः स निर्वाक्यो हनूमान् शिंशुपाद्रुमे।।5.24.14।।

यसीतां सन्तर्जयन्तीस्ता राक्षसीरशृणोत् कपिः।





तामभिक्रम्य सङ्कृद्धा वेपमानां समन्ततः।।5.24.15।।

भृशं संलिलिहुर्दीप्तान् प्रलम्बान् दशनच्छदान्।





ऊचुश्च परमक्रुद्धाः प्रगृह्याशु परश्वधान्।।5.24.16।।

नेयमर्हति भर्तारं रावणं राक्षसाधिपम्।





सा भर्त्स्यमाना भीमाभी राक्षसीभिर्वरानना।।5.24.17।।

सबाष्पमप सर्पन्ती शिंशुपां तामुपागमत्।





ततस्तां शिंशुपां सीता राक्षसीभिः समावृता।।5.24.18।।

अभिगम्य विशालाक्षी तस्थौ शोकपरिप्लुता।





तां कृशां दीनवदनां मलिनाम्बरधारिणीम्।।5.24.19।।

भर्त्सयाञ्चक्रिरे सीतां राक्षस्यस्तां समन्ततः।





ततस्तां विनता नाम राक्षसी भीमदर्शना।।5.24.20।।

अब्रवीत्कुपिताकारा कराला निर्णतोदरी।





सीते पर्याप्तमेतावद्भर्तुः स्नेहो निदर्शितः।।5.24.21।।

सर्वात्रातिकृतं भद्रे व्यसनायोपकल्पते





परितुष्टास्मि भद्रं ते मानुषस्ते कृतो विधिः।।5.24.22।।

ममापि तु वचः पथ्यं ब्रुवन्त्याः कुरु मैथिलि।





रावणं भज भर्तारं भर्तारं सर्वरक्षसाम्।।5.24.23।।

विक्रान्तं रूपवन्तं च सुरेशमिव वासवम्।

दक्षिणं त्यागशीलं च सर्वस्य प्रियदर्शनम्।।5.24.24।।




मानुषं कृपणं रामं त्यक्त्वा, रावणमाश्रय।

दिव्याङ्गरागा वैदेहि दिव्याभरणभूषिता।।5.24.25।।

अद्यप्रभृति सर्वेषां लोकानामीश्वरी भव।





अग्नेः स्वाहा यथा देवी शची वेन्द्रस्य शोभने।।5.24.26।।

किं ते रामेण वैदेहि कृपणेन गतायुषा।





एतदुक्तं च मे वाक्यं यदि त्वं न करिष्यसि।।5.24.27।।

अस्मिन्मुहूर्ते सर्वास्त्वां भक्षयिष्यामहे वयम्।





अन्या तु विकटा नाम लम्बमानपयोधरा।।5.24.28।।

अब्रवीत्कुपिता सीतां मुष्टिमुद्यम्य गर्जती।





बहून्यप्रियरूपाणि वचनानि सुदुर्मते।।5.24.29।।

अनुक्रोशान्मृदुत्वाच्च सोढानि तव मैथिलि।




न च नः कुरुषे वाक्यं हितं कालपुरस्कृतम्।।5.24.30।।

आनीतासि समुद्रस्य पारमन्यैर्दुरासदम्।

रावणान्तःपुरं घोरं प्रविष्टा चासि मैथिलि।।5.24.31।।





रावणस्य गृहे रुद्धामस्माभिस्तु सुरक्षिताम्।

न त्वां शक्तः परित्रातुमपि साक्षात्पुरन्दरः।।5.24.32।।





कुरुष्व हितवादिन्या वचनं मम मैथिलि।

अलमश्रुप्रपातेन त्यज शोकमनर्थकम्।।5.24.33।।





भज प्रीतिं च हर्षं च त्यजैतां नित्यदैन्यताम्।

सीते राक्षसराजेन सह क्रीड यथासुखम्।।5.24.34।।





जानासि हि यथा भीरु स्त्रीणां यौवनमध्रुवम्।

यावन्न ते व्यतिक्रामेत्तावत्सुखमवाप्नुहि।।5.24.35।।





उद्यानानि च रम्याणि पर्वतोपवनानि च।

सह राक्षसराजेन चर त्वं मदिरेक्षणे।।5.24.36।।





स्त्री सहस्राणि ते सप्त वशे स्थास्यन्ति सुन्दरि।

रावणं भज भर्तारं भर्तारं सर्वरक्षसाम्।।5.24.37।।





उत्पाट्य वा ते हृदयं भक्षयिष्यामि मैथिलि।

यदि मे व्याहृतं वाक्यं न यथावत्करिष्यसि।।5.24.38।।





ततश्चण्डोदरी नाम राक्षसी क्रोधमूर्छिता।

भ्रामयन्ती महच्छूलमिदं वचनमब्रवीत्।।5.24.39।।





इमां हरिणलोलाक्षीं त्रासोत्कम्पिपयोधराम्।

रावणेन हृतां दृष्टवा दौहृदो मे महानभूत्।।5.24.40।।






यकृत्प्लीहमथोत्पीडं हृदयं च सबन्धनम्।

आन्त्राण्यपि तथा शीर्षं खादेयमिति मे मतिः।।5.24.41।।





ततस्तु प्रघसा नाम राक्षसी वाक्यमब्रवीत्।

कण्ठमस्या नृशंसायाः पीडयाम किमास्यते।।5.24.42।।





निवेद्यतां ततो राज्ञे मानुषी सा मृतेति ह।

नात्र कश्चन संदेहः खादतेति स वक्ष्यति।।5.24.43।।





ततस्त्वजामुखी नाम राक्षसी वाक्यमब्रवीत्।

विशस्येमां ततः सर्वाः समान् कुरुत पिण्डकान्।।5.24.44।।





विभजाम ततः सर्वा विवादो मे न रोचते।

पेयमानीयतां क्षिप्रं लेह्यमुच्चावचं बहु।।5.24.45।।





ततः शूर्पणखा नाम राक्षसी वाक्यमब्रवीत्।

अजामुख्या यदुक्तं हि तदेव मम रोचते।।5.24.46।।





सुरा चानीयतां क्षिप्रं सर्वशोकविनाशिनी।

मानुषं मांसमास्वाद्य नृत्यामोऽथ निकुम्भिलाम्।।5.24.47।।





एवं संभर्त्स्यमाना सा सीता सुरसुतोपमा।

राक्षसीभिः सुघोराभिर्दैर्यमुत्सृज्य रोदिति।।5.24.48।।





इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे चतुर्विंशस्सर्गः।










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